दहेज से जुड़े अपराधों के मामलों के जल्द निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और हाईकोर्ट को कई अहम निर्देश जारी किए। कोर्ट ने दहेज निषेध अधिकारियों की व्यवस्था को प्रभावी बनाने, दहेज हत्या और वैवाहिक क्रूरता से जुड़े मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुनने और लंबे समय से लंबित मामलों की नियमित निगरानी करने को कहा।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 20 अगस्त को ये निर्देश जारी किए थे। पीठ उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अजमल बेग मामले में 15 दिसंबर 2025 को दिए गए अपने फैसले के अनुपालन की समीक्षा कर रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट और राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को हर साल 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी और 498-ए, भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं 80 और 85 तथा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के तहत लंबित मामलों में पर्याप्त कमी नहीं आ जाती।
इन रिपोर्ट में लंबित और निपटाए गए मामलों के आंकड़े, मामलों की चरणवार स्थिति, जागरूकता अभियानों का विवरण, दहेज निषेध अधिकारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण कार्यक्रम और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में उठाए गए कदमों की जानकारी देनी होगी।
कोर्ट ने कहा कि दहेज लेने और देने वाले कई लोग खुले तौर पर ऐसा करने के बावजूद बच निकलते हैं। न्यायपालिका के विभिन्न फैसलों में भी दहेज निषेध अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाइयों का उल्लेख किया गया।
कोर्ट ने कहा कि दहेज की प्रथा समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी है और इसमें तेजी से बदलाव संभव नहीं है। इसलिए विधायिका, न्यायपालिका, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और नागरिक समाज समेत सभी संबंधित पक्षों को मिलकर लगातार प्रयास करने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को दहेज निषेध अधिकारियों की प्रभावी कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने और उनके बारे में लोगों तक पर्याप्त जानकारी पहुंचाने का निर्देश दिया। इसके साथ ही वन स्टॉप सेंटर, परिवार परामर्श केंद्र, महिला सहायता डेस्क, पीड़ित सहायता व्यवस्था, हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणालियों को मजबूत करने को कहा गया, ताकि पीड़ित महिलाओं को सहायता और कानूनी उपाय आसानी से मिल सकें।
कोर्ट ने शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर दहेज प्रथा, लैंगिक समानता, संवैधानिक मूल्यों और महिलाओं के अधिकारों को लेकर लगातार जागरूकता और संवेदनशीलता कार्यक्रम चलाने का निर्देश दिया।
इन कार्यक्रमों को शैक्षणिक पाठ्यक्रम, जागरूकता अभियान, सामुदायिक कार्यक्रम और कानूनी साक्षरता अभियानों के माध्यम से आगे बढ़ाने को कहा गया। धारा 304-बी और 498-ए के तहत आने वाले मामलों को अदालतों में, जहां तक व्यावहारिक हो, प्राथमिकता वाले मामलों के रूप में लेने और उनका जल्द निपटारा सुनिश्चित करने को कहा गया। जिला न्यायपालिका को तीन साल से अधिक समय से लंबित मामलों की पहचान करने और खासकर आरोप तय होने या गवाही दर्ज होने के चरण में अटके मामलों की मासिक या त्रैमासिक आधार पर समीक्षा करने का निर्देश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों की प्रगति को समयबद्ध बनाने के लिए भी दिशा-निर्देश दिए। ट्रायल कोर्ट को आरोपपत्र दाखिल होने के बाद आरोपी की उपस्थिति जल्द सुनिश्चित करने का प्रयास करना होगा। सामान्य परिस्थितियों में आरोपपत्र दाखिल होने के 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय करने का प्रयास किया जाना चाहिए। आरोप तय होने के बाद उचित समय के भीतर गवाही शुरू हो और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 309 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 346 के अनुसार गवाही लगातार या रोजाना दर्ज करने का प्रयास किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट और राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। इन रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट लंबित मामलों की स्थिति और अपने निर्देशों के अनुपालन की समीक्षा करेगा। मामले को अनुपालन और नियमित समीक्षा रिपोर्ट पर विचार के लिए 15 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया।
(जनचौक ब्यूरो)